Sunday, October 17, 2021

“विशेष लेख “- भोपाल के इतिहास की असाधारण घटना, महात्मा गांधी का सितम्बर 29 में भोपाल प्रवास

वर्ष 1929 में 3 दिवस के प्रवास पर भोपाल आए महात्मा गांधी ने “राम- राज्य” की परिकल्पना को जनमानस के समक्ष काफी सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि राम राज्य से मेरा मतलब है – ईश्वर का राज। मेरे लिए राम और रहीम में कोई अंतर नहीं है। मेरे लिए तो सत्य और सत्कार्य ही ईश्वर है। बापू ने आगे कहा कि पता नहीं, जिस रामराज्य की कल्पना हमें सुनने को मिलती है वह कभी इस पृथ्वी पर था या नहीं, लेकिन प्राचीन रामराज्य का आदर्श प्रजातंत्र के आदेशों से बहुत कुछ मिलता जुलता है और कहा गया है कि रामराज्य में दरिद्र से दरिद्र व्यक्ति भी कम खर्च और अवधि में न्याय प्राप्त कर सकता था।
गाँधीजी सन् 1929 के सितम्बर माह में तीन दिनों के लिये भोपाल आये थे। उनकी यह यात्रा भोपाल के नवाब श्री हमीदुल्ल खां के आमंत्रण पर हुई थी और इस यात्रा में वे नवाब साहब के अतिथि रहे। इसके पहले ही अस्वस्थता के कारण गाँधीजी को आगरा में एक सप्ताह का विश्राम करना पड़ा था और भोपाल – प्रवास में भी वे पूर्णतया स्वस्थ नहीं थे। इसी कारण इस यात्रा में केवल एक ही सार्वजनिक सभा रखी गयी जो भोपाल के बेनजीर मैदान में हुई थी।
गाँधीजी की इस यात्रा का निश्चित उद्देश्य क्या था, इस संबंध में अंतिम रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता, किंतु इतना निश्चित है कि इस समय नवाब साहब और गाँधीजी के बीच विस्तार से वार्ता हुई और उसका विषय हिन्दू – मुस्लिम एकता भी हो सकता है। वैसे, इस समय खादी – विशेषज्ञ श्री जमनालाल बजाज तथा शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. जाकिर हुसैन को भी यहाँ बुला लिया गया था जिससे मालूम पड़ता है कि उनकी वार्ता कृषि तथा शिक्षा के विषय पर भी अवश्य हुई होगी। कुमारी मीरा बहन, श्री सी.एफ. एण्ड्रूज तथा महादेवभाई देसाई उनके साथ थे ही।
गाँधीजी की यह यात्रा डॉ. एम. ए. अंसारी के प्रयत्नों से हुई थी। डॉ. अंसारी के सिवा डॉ. अब्दुल रहमान, श्री हसन मुहम्मद हयात तथा श्री शोएब कुरेशी आदि अनेक व्यक्ति ऐसे थे जो गाँधीजी के निकट संपर्क में आये थे और नवाब भोपाल से भी घनिष्ट रूप से संबंधित थे। श्री शोएब कुरेशी मौलाना मुहम्मद अली के दामाद थे तथा गाँधीजी के जेल – जीवन में ” यंग इंडिया ” का संपादन कार्य करते थे। इसके सिवा, श्री मोतीलाल नेहरू, हकीम अजमल खां, श्री तेज बहादुर सप्रू आदि से भी नवाब साहब के अच्छे संबंध थे और इसी कारण वे गाँधीजी के भी निकट आ गये थे। यह उल्लेखनीय है कि भोपाल के नवाब देश के उन इने – गिने नरेशों में एक थे जिनका आतिथ्य गाँधीजी ने स्वीकार किया था।
नवाब साहब ने गाँधीजी की आवास – व्यवस्था अपने अहमदाबाद स्थित राज – प्रासाद में ” राहत – मंजिल ” नामक कोठी में की थी। 11 सितम्बर को जब वे भोपाल पहुंचे तब उन्हें ज्वर हो गया था। खिलाफत आंदोलन के उनके पुराने सहयोगी डॉ. अब्दुल रहमान उस समय भोपाल में ही संचालक, स्वास्थ्य सेवा के पद पर कार्य कर रहे थे। डॉ . रहमान ने उनके स्वास्थ्य की परीक्षा की और उस संबंध में दो बुलेटिन भी निकाले गये।

“सार्वजनिक सभा”

दूसरे दिन बेनजीर मैदान में गाँधीजी के सम्मान में एक सार्वजनिक सभा हुई जो भोपान शासन की ओर से ही बुलायी गयी थी और “इस प्रकार इसे भोपाल के इतिहास की एक असाधारण घटना कहा जा सकता है”। सभा की व्यवस्था बहुत सुंदर ढंग से की गयी थी और मंच तथा मण्डप आदि की सज्जा में पूर्णतया खादी का ही प्रयोग किया गया  था। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि गाँधीजी के आवास तथा उनके आने – जाने के मार्ग पर भी खादी की ही सजावट की गयी थी और नवाब साहब ने इस ओर विशेष ध्यान दिया था। सभा में नवाब साहब की ओर से उनके विधि – सचिव राजा अवधनारायण बिसारिया उपस्थित थे। सबसे पहले इस सभा में गाँधीजी को भोपाल के नागरिकों की ओर से खादी कार्य के लिये 1035 रुपयों की थैली भेंट की गयी। इस सभा में भोपाल एवं निकटवर्ती स्थानों के रहने वाले लगभग दस हजार व्यक्ति उपस्थित थे।

“गाँधीजी का भाषण”

इसके पश्चात् गाँधीजी ने हिन्दी में अपना भाषण प्रारंभ किया। आरंभ में उन्होंने नवाब साहब के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शिता की तथा कहा कि नवाब साहब और भोपाल को जनता के प्रति उनके मन में जो प्रेम की भावना थी वह उन्हें यहाँ खींच लायी।

“रामराज्य की व्याख्या”

आगे बोलते हुए गाँधीजी ने विश्वास व्यक्त किया कि किसी भी देश के लिये नरेशों का शासन भी प्रजातंत्र के समान महानता को प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है। यही कारण है कि मेरी देशी नरेशों से कोई दुश्मनी नहीं है और मेरा विश्वास है कि देशी नरेश भी यदि पूरी तरह प्रयत्नशील हों तो देश में रामराज्य की स्थापना हो सकती है। मुस्लिम – बहुल श्रोताओं के समक्ष जब गाँधीजी ने रामराज्य की बात कही तब उसकी आगे व्याख्या करना भी उन्होंने आवश्यक समझा। “ रामराज्य का अर्थ हिन्दू राज्य नहीं है। मैं मुसलमान भाइयों से कहना चाहता हूँ कि वे रामराज्य का अर्थ गलत न समझे। रामराज्य से मेरा मतलब है- ईश्वर का राज।
मेरे लिये राम और रहीम में कोई अंतर नहीं है। मेरे लिये तो सत्य और सत्कार्य ही ईश्वर हैं। पता नहीं, जिस रामराज्य की कल्पना हमें सुनने को मिलती है वह कभी इस पृथ्वी पर था भी अथवा नहीं, लेकिन प्राचीन रामराज्य का आदर्श प्रजातंत्र के आदेशो से बहुत कुछ मिलता – जुलता है और कहा गया है कि रामराज्य में दरिद्र से दरिद्र व्यक्ति भी कम खर्च में और अवधि में न्याय प्राप्त कर सकता था। यहां तक कहा गया है कि रामराज्य में एक कुत्ता भी न्याय प्राप्त कर सकता था। आगे गांधीजी ने कहा कि यदि देश में शासक और शासित ईश्वर पर भरोसा रखने वाले हों तो वह शासन दुनिया की सभी प्रजातंत्रीय व्यवस्थाओं से उत्तम होगा।

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