Thursday, December 2, 2021

पुरावैभवों तथा शैलचित्रों से समृद्ध है रायसेन जिला

पुरासम्पदाओं एवं शैलचित्रों से समृद्ध रायसेन जिला प्रदेश में एकमात्र ऐसा जिला है जिसे दो विश्व धरोहर होने का गौरव प्राप्त है। विश्व में अद्भुत स्थापत्य कला के रूप में तथा पूरब के सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध विशाल भोजपुर शिव मंदिर तीसरे विश्व धरोहर के रूप में शामिल होने की प्रक्रिया में है। भीमबैठका जहां रंग और रेखाओं के द्वारा आदिम जीवन शैली को समझने का अवसर देती है, तो वहीं सांची सत्य और शांति का मार्ग दिखाती है।
जितनी बड़ी संख्या में रॉक शेल्टर और रॉक पेंटिंग रायसेन जिले में हैं, उतनी शायद देश के किसी अन्य जिले तथा दूसरे देशों में कहीं नहीं है। ऐतिहासिक काल एवं मध्यकाल में बनी यह रॉक पेंटिंग आज भी अपने मूल स्वरूप में विद्यमान हैं। रायसेन जिले के विशाल भू-भाग में फैले रॉक शेल्टर में वृहद संख्या में बनी रॉक पेंटिंग को देखते हुए रायसेन जिले को विश्व धरोहरों की राजधानी भी कहा जा सकता है। जिले में विश्व धरोहर सांची बौद्ध स्तूप तथा भीमबेटका के साथ ही प्रसिद्ध भोजपुर शिव मंदिर, रायसेन किला, जामगढ़-भगदेई मंदिर, आशापुरी मंदिर श्रृंखला, द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया तथा बौद्ध स्मारक सतधारा-सोनारी सहित अनेक दर्शनीय स्थल हैं।

सांची बौद्ध स्तूप

सांची बौद्ध स्तूप दुनिया भर में बौद्ध धर्माबलम्बियों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। पुरातत्व की दृष्टि से इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर में भी शामिल किया गया है। यहां कई बौद्ध स्मारक हैं, जो तीसरी शताब्दी ई.पू से बारहवीं शताब्दी के बीच के काल के हैं।
सांची के स्तूपों का मुख्य आकर्षण उसके चारों दिशाओं के तोरण द्वार हैं। इन तोरण द्वार पर जातक कथाओं का उत्कीर्णन है। यहाँ छोटे-बड़े अनेकों स्तूप है, जिनमें स्तूप संख्या-2 सबसे बड़ा है। इस स्तूप को घेरे हुए कई तोरण भी बने हैं। स्तूप संख्या-1 के पास कई लघु स्तूप भी हैं, उन्हीं के समीप एक गुप्त कालीन पाषाण स्तंभ भी है। सांची का महान मुख्य स्तूप, मूलतः सम्राट अशोक महान ने तीसरी शती, ई.पू. में बनवाया था। इसके केन्द्र में एक अर्धगोलाकार ईट निर्मित ढांचा था। स्तूप परिसर स्थित मंदिर में भगवान बुद्ध के अनुयायी महामोग्लयान तथा सारिपुत्र की पवित्र अस्थियां रखी हुई हैं।

सतधारा-सोनारी

विश्व धरोहर सांची के स्तूपों से भी पुराने बौद्ध स्मारक रायसेन जिले के सांची विकासखण्ड के सतधारा एवं सोनारी में स्थित हैं। तीसरी शताब्दी ई.पू. से बारहवीं शताब्दी के मध्य काल के इन स्तूपों का विशेष महत्व है। बौद्ध स्तूप वन क्षेत्र में होने के कारण प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारने का भी अवसर मिलता है। यहां देश-विदेश से अनेक पर्यटन आते हैं।

भीमबेटका

जिले के ओबेदुल्लागंज शहर से 9 किलोमीटर दूर भीमबेटका पाषाण आश्रय स्थल स्थित है। भीमबेटका पाषाण आश्रय स्थल एक आर्कियोलॉजिकल साईट और पाषाण काल और भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन जीवन दृष्टी को दर्शाने वाली जगह है और यही से दक्षिणी एशियाई पाषाण काल की शुरुवात हुई थी।
यहाँ पर स्थापित कुछ आश्रय होमो एरेक्टस द्वारा 1,00,000 साल पहले हुए बसाये हुए है। भीमबेटका में पायी जाने वाली कुछ कलाकृतियाँ तो तक़रीबन 30,000 साल पुरानी है। यहाँ की गुफाये हमें प्राचीन नृत्य कला का उदाहरण भी देती है। वर्ष 2003 में इन गुफाओ को वर्ल्ड हेरिटेज साईट घोषित किया गया था।

भोजपुर शिव मंदिर

भोजपुर स्थित परमारकालीन शिव मंदिर देश-विदेश में उत्तर का सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। इस शिव मंदिर को दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग के रूप में पहचाना जाता है। गर्भगृह में स्थित 7.5 फुट लंबा और 17.8 फुट परिधि का यह शिवलिंग एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया है जो आश्चर्यजनक है।
अपने अपार और जटिल संरेखण में शिवलिंग के साथ इस मंदिर को पूरब का सोमनाथ होने का गौरव प्राप्त है। परमारकालीन इस मंदिर पर प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर विशाल मेला लगता है। संस्कृति एवं पर्यटन विभाग द्वारा तीन दिवसीय भोजपुर उत्सव का आयोजन किया जाता है।

रायसेन किला

लगभग 12वीं शताब्दी में निर्मित रायसेन किला देश के ख्यात दुर्गो में शामिल है। इसे अजेय दुर्ग होने का गौरव भी प्राप्त है। बेहद गौरवशाली परंपरा इस किले के साथ जुडी हुई। इतिहास में कई जगह इसका वर्णन सुनने को भी मिलता है तथा देश के कई बडे राजाओं ने इस पर शासन किया है।
मुगलों के आक्रमण भी इस किले पर कई बार हुए लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से बेहद नायाब तरीके से बने इस किले की सुरक्षा में कभी कोई सेंध नही लगा पाया। रायसेन के ऐतिहासिक अजेय दुर्ग की भव्य इमारतें आज भी आसमान में मस्तक ऊॅचा किए खड़ी हुई हैं। राजा शिलादित्य सहित कई गौड़ राजाओं का इतिहास इस किले से जुड़ा हुआ है। इस किले में प्रसिद्ध शिव मंदिर, रानी महल, रानीताल, झिंझरी महल, इत्रदान, बारादरीमहल, कचहरी महल आदि महत्वपूर्ण महल स्थित है। यह किला रैन वाटर हार्वेस्टिंग का अनूठा उदाहरण है।

जामगढ़-भगदेई मंदिर

रायसेन जिले की बरेली तहसील में जामगढ़-भगदेई का शिव मंदिर स्थापत्य कला का एक अनुपम उदाहरण है। यह मंदिर 9वीं-10वीं शताब्दी का है। मंदिर महामण्डप अंतराल और गर्भगृह से युक्त है। यह पंचरथ योजना से निर्मित है। मंदिर का बाह्य भाग भी विशेष कलापूर्ण है, जिसमें ब्राम्हण देवी-देवताओं का अंकन किया गया है। जनश्रुति के अनुसार यह स्थान रामायण काल के जामवंत से संबंधित है। यहां जामवंत के पैरों के निशान भी देखने को मिलते हैं। ग्राम जामगढ़-भगदेई में परमार-प्रतिहार काल की समृद्ध पुरा-सम्पदा है। यहां मंदिरों की कई श्रृंखला और दुर्लभ मूर्तियां हैं। यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है।

आशापुरी मंदिर श्रृखंला

रायसेन जिले की गौहरगंज तहसील में स्थित आशापुरी ग्राम अपनी पुरातत्वीय वैभव के लिये प्रसिद्ध है। यहां ग्राम के समीपस्थ चार समूहों यथा आशादेवी मंदिर, भूतनाथ मंदिर, बिलौटा तथा सतमसियां में मंदिर के अवशेष विगत दशकों में चिन्हाकिंत हुये थे। आशापुरी में स्थित यह मंदिर 10वीं और 11वीं सदी में बनाए गए थे।
यहां बिखरी पुरातत्वीय महत्व की कलाकृतियां विशेषतः प्रतिमाओं की सुरक्षा, अध्ययन व शोध को दृष्टिगत रखते हुए संकलन कर वर्ष 1977 में स्थानीय संग्रहालय की स्थापना की गई। यहां के संग्रहालय में बिलौटा मंदिर समूह से प्राप्त विष्णु चतुष्टिका तथा आस पास के अन्य मंदिरो से संकलित विष्णु के मोहिनी रूप की प्रतिमा, शिव, विष्णु, सूर्य, ब्रह्मा, हरिहर, दिक्पाल, एवं देवी प्रतिमाएं महत्वपूर्ण है। संग्रहालय में संग्रहीत विशालकाय गणेश की प्रतिमा अपनी विशालता तथा शिल्पकला की दृष्टि से अद्वितीय है। संग्रहालय में संग्रहीत बिलौटा से प्राप्त दो विष्णु चतुष्टिका शिल्पकला की द्रष्टि से महत्वपूर्ण है। इन दोनों ही चतुष्टिकाओं में नृसिंह, नृवराह, हरिहर एवं वामन का शिल्पाकंन है।

द ग्रेट वाल ऑफ इंडिया

जिले में देवरी के पास स्थित ग्राम गोरखपुर में लगभग 90 किलोमीटर लंबी एक परमारकालीन दीवार मिली है, जिसे अब तक की भारत में सबसे बड़ी दीवार माना गया है। इसे ‘‘द ग्रेव वाल ऑफ इंडिया’’ का नाम भी दिया गया है। यह दीवार रायसेन जिले के उदयपुरा के गोरखपुर गांव से सटे जंगल से शुरू होती है और बाड़ी बरेली के पास चौकीगढ़ किले तक जाती है।
इस दीवार की ऊंचाई 15 से 18 फीट और चौड़ाई 10 से 15 फीट है। कुछ जगह इसकी चौड़ाई 24 फीट तक है। दीवार को बनाने में लाल बलुआ पत्थर की बड़ी चट्टानों का इस्तेमाल किया है। इसके दोनों ओर विशाल चोकोर पत्थर लगाए गए हैं। दीवार परिसर के आसपास कई जमींदोज मंदिरों के अवषेष भी मिले हैं। यहां एक बेहद प्राचीन भैरव की प्रतिमा भी मिली है, जो प्राचीन होने के साथ-साथ दुर्लभ भी है। यहीं पास में मोघा डेम भी स्थित है।

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